ग़ज़ल
पहले कुफ़्र करते थे अब खुदा को याद करते हैं
अफ़ीम बेचने वाले आजकल जेहाद करते हैं
उल्लुओं पर फ़िदा तो हैं पड़ोसी पर जानता नहीं
ये वो ही परिन्दे हैं जो चमन बर्बाद करते हैं
गोलियाँ कुछ भी कहें हकीकत तो ये ही है लेकिन
इन्सां बस वही है जो बस्तियाँ आबाद करते हैं
बन्दूकें लिख रही हैं अब फ़तवों का मज़मून वहाँ
अब तो उलेमा भी वहाँ झुक कर फ़रियाद करते हैं
नेकियाँ इन्सान की याद करते हैं लोग अक्सर
अफसोस तो ये है मगर मरने के बाद करते हैं
लक्ष्मी नारायण अग्रवाल करते हैं
पहले कुफ़्र करते थे अब खुदा को याद करते हैं
अफ़ीम बेचने वाले आजकल जेहाद करते हैं
उल्लुओं पर फ़िदा तो हैं पड़ोसी पर जानता नहीं
ये वो ही परिन्दे हैं जो चमन बर्बाद करते हैं
गोलियाँ कुछ भी कहें हकीकत तो ये ही है लेकिन
इन्सां बस वही है जो बस्तियाँ आबाद करते हैं
बन्दूकें लिख रही हैं अब फ़तवों का मज़मून वहाँ
अब तो उलेमा भी वहाँ झुक कर फ़रियाद करते हैं
नेकियाँ इन्सान की याद करते हैं लोग अक्सर
अफसोस तो ये है मगर मरने के बाद करते हैं
लक्ष्मी नारायण अग्रवाल करते हैं
कुफ्र करते, क्या खुदा को याद करते हो ?
ReplyDeleteदरिंदगी की हद करके जिहाद करते हो?? [ऋषभ]