Saturday, December 10, 2011

फिर कोई फकीर चला

फिर कोई फकीर चला




फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने

निकल पड़ा है कृष्ण कोई कंस को फिर मारने



जब से लाल क्रोध से जमीं हुई है देखिए

बादलों में खलबली मची हुई है देखिए

अपने हक के नीर को जमीं पे फिर उतारने

फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने



मुठ्ठियां कसे हुए चल पड़े हैं लोग सब

जुल्म को उजाड़ने निकल पड़े हैं लोग सब

चमन को कॉट छॉट के चले हैं फिर निखारने

फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने



भेड़ियों की ऑख में दहशतों के साए हैं

साथ में फकीर क्यूं इतने लोग आए हैं

जंगलों की सूरतें चले हैं वो संवारने

फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने



किले में बादशाह के खुसुर फुसुर है हो रही

क्रोध से फकीर के बच सकेगा क्या कोई

कुर्सियों पे फैलते कूड़े को फिर बुहारने

फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने



                                                                                              लक्ष्मी नारायण अग्रवाल