Saturday, August 14, 2010

kavita

अरमानों की महफ़िल है चले आओ

खुश बहुत आज या दिल है चले आओ

तुमसे मिलकर कैसा लगा है मुझको

बताना बहुत मुस्किल है चले आओ

विभाजन

हाथ तुम्हारा था खंजर तुम्हारा था

मेरे क़त्ल का वो मंजर तुम्हारा था

मेरे लहू के निशा अब भी हैं वहां

मोहल्ला तुम्हारा घर तुम्हारा था

Tuesday, August 3, 2010

दुनिया बदलने की बात करते हैं आप

खुद की बात भी कभी कीजिये जनाब

आंखों से पिलाने का वादा कीजिए

मैं पीना छोड़ दूंगा शराब

Monday, July 26, 2010

आज कि कविता
१-मुझसे बात करने कि फुर्सत नहीं है अब
मेरे महबूब ने मोबाइल ले लिया है
आतंकवाद का जवाब
२ -मै भी पलट कर मार सकता हूँ तुम्हें
बिलकुल तुम्हारे जैसे हैं मेरे हाथ भी
पर नहीं
मेरा ह्रदय तुम्हारे जैसा नहीं है