फिर कोई फकीर चला
फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने
निकल पड़ा है कृष्ण कोई कंस को फिर मारने
जब से लाल क्रोध से जमीं हुई है देखिए
बादलों में खलबली मची हुई है देखिए
अपने हक के नीर को जमीं पे फिर उतारने
फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने
मुठ्ठियां कसे हुए चल पड़े हैं लोग सब
जुल्म को उजाड़ने निकल पड़े हैं लोग सब
चमन को कॉट छॉट के चले हैं फिर निखारने
फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने
भेड़ियों की ऑख में दहशतों के साए हैं
साथ में फकीर क्यूं इतने लोग आए हैं
जंगलों की सूरतें चले हैं वो संवारने
फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने
किले में बादशाह के खुसुर फुसुर है हो रही
क्रोध से फकीर के बच सकेगा क्या कोई
कुर्सियों पे फैलते कूड़े को फिर बुहारने
फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने
लक्ष्मी नारायण अग्रवाल
फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने
निकल पड़ा है कृष्ण कोई कंस को फिर मारने
जब से लाल क्रोध से जमीं हुई है देखिए
बादलों में खलबली मची हुई है देखिए
अपने हक के नीर को जमीं पे फिर उतारने
फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने
मुठ्ठियां कसे हुए चल पड़े हैं लोग सब
जुल्म को उजाड़ने निकल पड़े हैं लोग सब
चमन को कॉट छॉट के चले हैं फिर निखारने
फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने
भेड़ियों की ऑख में दहशतों के साए हैं
साथ में फकीर क्यूं इतने लोग आए हैं
जंगलों की सूरतें चले हैं वो संवारने
फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने
किले में बादशाह के खुसुर फुसुर है हो रही
क्रोध से फकीर के बच सकेगा क्या कोई
कुर्सियों पे फैलते कूड़े को फिर बुहारने
फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने
लक्ष्मी नारायण अग्रवाल