Saturday, December 10, 2011

फिर कोई फकीर चला

फिर कोई फकीर चला




फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने

निकल पड़ा है कृष्ण कोई कंस को फिर मारने



जब से लाल क्रोध से जमीं हुई है देखिए

बादलों में खलबली मची हुई है देखिए

अपने हक के नीर को जमीं पे फिर उतारने

फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने



मुठ्ठियां कसे हुए चल पड़े हैं लोग सब

जुल्म को उजाड़ने निकल पड़े हैं लोग सब

चमन को कॉट छॉट के चले हैं फिर निखारने

फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने



भेड़ियों की ऑख में दहशतों के साए हैं

साथ में फकीर क्यूं इतने लोग आए हैं

जंगलों की सूरतें चले हैं वो संवारने

फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने



किले में बादशाह के खुसुर फुसुर है हो रही

क्रोध से फकीर के बच सकेगा क्या कोई

कुर्सियों पे फैलते कूड़े को फिर बुहारने

फिर कोई फकीर चला तख्त को ललकारने



                                                                                              लक्ष्मी नारायण अग्रवाल

Sunday, October 23, 2011

उल्लू जी का राज

शून्य हुई संवेदना बिखरा आज समाज


दास हुई बाजार की विवेक की आवाज

विवेक की आवाज बोले अजब ही भाषा

धर्म युद्ध उसको लगे सिर्फ एक तमाशा

हर चौपाल पे दिखता दृष्य सही है आज

लक्ष्मी जी की अर्चना उल्लू जी का राज
     
                                                           लक्ष्मी नारायण अग्रवाल

Saturday, October 1, 2011

गांधी के नाम


जैसे ही मंत्री जी की गाड़ी आकर रूकी
गाँधी के वेश में एक भिखारी ने आवाज लगाई

गाँधी के नाम पर कुछ देते जाना बाबा
बाल बच्चों कं लिए दुआएँ लेते जाना बाबा
 किन्तु देख भिखारी को गांधी के वेश में
मंत्री को गुस्सा आ गया
क्रोध से उसका चेहरा तमतमा गया
बोला,
शर्म नहीं आती
तुम ये कैसा काम कर रहे हो
गांधी के नाम को बदनाम कर रहे हो
वाह मंत्री जी वाह
मैं गांधी के नाम पर मागूं तो शर्म की बात
 तुम मांगो तो कोई बात नहीं
अपने कर्म देखो
किसी को नसीहत दे सको
अब तुम्हारी इतनी औकात नहीं
अरे मेरी ही नहीं
देश के हर गांधीवादी की यही कहानी है
भिखारी बन गया आज गांधी अगर
तो ये तुम्हारी ही मेहरबानी है
                              
                                                                                     लक्ष्मी नारायण अग्रवाल

Friday, September 30, 2011

जेहाद

                                  ग़ज़ल


पहले कुफ़्र करते थे अब खुदा को याद करते हैं

अफ़ीम बेचने वाले आजकल जेहाद करते हैं


उल्लुओं पर फ़िदा तो हैं पड़ोसी पर जानता नहीं

ये वो ही परिन्दे हैं जो चमन बर्बाद करते हैं


गोलियाँ कुछ भी कहें हकीकत तो ये ही है लेकिन

इन्सां बस वही है जो बस्तियाँ आबाद करते हैं


बन्दूकें लिख रही हैं अब फ़तवों का मज़मून वहाँ

अब तो उलेमा भी वहाँ झुक कर फ़रियाद करते हैं


नेकियाँ इन्सान की याद करते हैं लोग अक्सर

अफसोस तो ये है मगर मरने के बाद करते हैं

                                                             लक्ष्मी नारायण अग्रवाल करते हैं


Saturday, September 17, 2011

मोदी का अनशन

पहले अन्ना हजारे और अब मोदी का अनशन,तब भी कांग्रेस ही ज्यादा परेशान थी अब भी कांग्रेस ही परेशान है,शायद खाओ और खिलाओं संस्कृति के लोगों को अनशन से एलर्जी है। समझ में नहीं आता मोदी का नाम आते ही क्यों लोग सिर्फ गुजरात के दंगों की बात क्यों करते हैं,साथ में कांग्रेस के गुंडों द्धारा 1984 में पॉच हजार सिख्खों के कत्ल की बात क्यों नहीं करते,1947 में छै लाख हिन्दूओं के कत्ल की बात क्यों नहीं करते,1947-48 में मुसलमान रजाकारों द्धारा हैदराबाद और उसके आसपास में दस हजार हिन्दूओं के कत्ल की बात क्यों नहीं करते,हैदराबाद में दंगों में अब तक कई हजार हिन्दूओं के कत्ल की बात क्यों नहीं करते,काश्मीर के पंडितों की बात क्यों नहीं करते।क्या इन्साफ सिर्फ मुसलमानों को मिलना चाहिए।कितनी हास्यापद बात है कि गुजरात के विकास को देखते हुए मुसलमान तो मोदी को माफ करने को तैयार है पर धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार हिन्दू उनको बार बार रोक रहे हैं।कांग्रेस को दस प्रतिशत मुसलमानों की भावनाओं की चिंता तो है पर नब्बे प्रतिशत उन हिन्दूओं की चिंता नहीं है जिन्होंने मोदी को बार बार चुन कर भेजा।


Monday, September 5, 2011

फिर भी इन नेताओं से वो कोठे वाली अच्छी थी

गजल


अब भी क्या शक है तुम को इस से तो गुलामी अच्छी थी

जो नाम कमाया है अब तक इससे गुम नामी अच्छी थीगजल



बेच के माँ को जेब भरी लानत है ऐसे बेटों पर

इससे तो मैं कहता हूँ गरीबी की कहानी अच्छी थी


घर में अंधेरा होता था पर दिल में सवेरा होता था

बिन बिजली के दीपों की वो होली दिवाली अच्छी थी


मिर्च से रोटी खाई लेकिन बच्चे बेचे नहीं कभी

शर्म जेब में थी कम से कम पैसों से खाली अच्छी थी


दुनिया भर से गाली खाके भिखारी ने ये बात कही

माँ का दल्ला कहलाने से हर एक गाली अच्छी थी


जिस्म बेच कर बच्चे पाले मजबूरी थी वेश्या की

फिर भी इन नेताओं से वो कोठे वाली अच्छी थी


लक्ष्मी नारायण अग्रवाल