Friday, September 30, 2011

जेहाद

                                  ग़ज़ल


पहले कुफ़्र करते थे अब खुदा को याद करते हैं

अफ़ीम बेचने वाले आजकल जेहाद करते हैं


उल्लुओं पर फ़िदा तो हैं पड़ोसी पर जानता नहीं

ये वो ही परिन्दे हैं जो चमन बर्बाद करते हैं


गोलियाँ कुछ भी कहें हकीकत तो ये ही है लेकिन

इन्सां बस वही है जो बस्तियाँ आबाद करते हैं


बन्दूकें लिख रही हैं अब फ़तवों का मज़मून वहाँ

अब तो उलेमा भी वहाँ झुक कर फ़रियाद करते हैं


नेकियाँ इन्सान की याद करते हैं लोग अक्सर

अफसोस तो ये है मगर मरने के बाद करते हैं

                                                             लक्ष्मी नारायण अग्रवाल करते हैं


1 comment:

  1. कुफ्र करते, क्या खुदा को याद करते हो ?
    दरिंदगी की हद करके जिहाद करते हो?? [ऋषभ]

    ReplyDelete