Monday, September 5, 2011

फिर भी इन नेताओं से वो कोठे वाली अच्छी थी

गजल


अब भी क्या शक है तुम को इस से तो गुलामी अच्छी थी

जो नाम कमाया है अब तक इससे गुम नामी अच्छी थीगजल



बेच के माँ को जेब भरी लानत है ऐसे बेटों पर

इससे तो मैं कहता हूँ गरीबी की कहानी अच्छी थी


घर में अंधेरा होता था पर दिल में सवेरा होता था

बिन बिजली के दीपों की वो होली दिवाली अच्छी थी


मिर्च से रोटी खाई लेकिन बच्चे बेचे नहीं कभी

शर्म जेब में थी कम से कम पैसों से खाली अच्छी थी


दुनिया भर से गाली खाके भिखारी ने ये बात कही

माँ का दल्ला कहलाने से हर एक गाली अच्छी थी


जिस्म बेच कर बच्चे पाले मजबूरी थी वेश्या की

फिर भी इन नेताओं से वो कोठे वाली अच्छी थी


लक्ष्मी नारायण अग्रवाल

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