गजल
अब भी क्या शक है तुम को इस से तो गुलामी अच्छी थी
जो नाम कमाया है अब तक इससे गुम नामी अच्छी थीगजल
बेच के माँ को जेब भरी लानत है ऐसे बेटों पर
इससे तो मैं कहता हूँ गरीबी की कहानी अच्छी थी
घर में अंधेरा होता था पर दिल में सवेरा होता था
बिन बिजली के दीपों की वो होली दिवाली अच्छी थी
मिर्च से रोटी खाई लेकिन बच्चे बेचे नहीं कभी
शर्म जेब में थी कम से कम पैसों से खाली अच्छी थी
दुनिया भर से गाली खाके भिखारी ने ये बात कही
माँ का दल्ला कहलाने से हर एक गाली अच्छी थी
जिस्म बेच कर बच्चे पाले मजबूरी थी वेश्या की
फिर भी इन नेताओं से वो कोठे वाली अच्छी थी
लक्ष्मी नारायण अग्रवाल
अब भी क्या शक है तुम को इस से तो गुलामी अच्छी थी
जो नाम कमाया है अब तक इससे गुम नामी अच्छी थीगजल
बेच के माँ को जेब भरी लानत है ऐसे बेटों पर
इससे तो मैं कहता हूँ गरीबी की कहानी अच्छी थी
घर में अंधेरा होता था पर दिल में सवेरा होता था
बिन बिजली के दीपों की वो होली दिवाली अच्छी थी
मिर्च से रोटी खाई लेकिन बच्चे बेचे नहीं कभी
शर्म जेब में थी कम से कम पैसों से खाली अच्छी थी
दुनिया भर से गाली खाके भिखारी ने ये बात कही
माँ का दल्ला कहलाने से हर एक गाली अच्छी थी
जिस्म बेच कर बच्चे पाले मजबूरी थी वेश्या की
फिर भी इन नेताओं से वो कोठे वाली अच्छी थी
लक्ष्मी नारायण अग्रवाल
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