Friday, September 30, 2011

जेहाद

                                  ग़ज़ल


पहले कुफ़्र करते थे अब खुदा को याद करते हैं

अफ़ीम बेचने वाले आजकल जेहाद करते हैं


उल्लुओं पर फ़िदा तो हैं पड़ोसी पर जानता नहीं

ये वो ही परिन्दे हैं जो चमन बर्बाद करते हैं


गोलियाँ कुछ भी कहें हकीकत तो ये ही है लेकिन

इन्सां बस वही है जो बस्तियाँ आबाद करते हैं


बन्दूकें लिख रही हैं अब फ़तवों का मज़मून वहाँ

अब तो उलेमा भी वहाँ झुक कर फ़रियाद करते हैं


नेकियाँ इन्सान की याद करते हैं लोग अक्सर

अफसोस तो ये है मगर मरने के बाद करते हैं

                                                             लक्ष्मी नारायण अग्रवाल करते हैं


Saturday, September 17, 2011

मोदी का अनशन

पहले अन्ना हजारे और अब मोदी का अनशन,तब भी कांग्रेस ही ज्यादा परेशान थी अब भी कांग्रेस ही परेशान है,शायद खाओ और खिलाओं संस्कृति के लोगों को अनशन से एलर्जी है। समझ में नहीं आता मोदी का नाम आते ही क्यों लोग सिर्फ गुजरात के दंगों की बात क्यों करते हैं,साथ में कांग्रेस के गुंडों द्धारा 1984 में पॉच हजार सिख्खों के कत्ल की बात क्यों नहीं करते,1947 में छै लाख हिन्दूओं के कत्ल की बात क्यों नहीं करते,1947-48 में मुसलमान रजाकारों द्धारा हैदराबाद और उसके आसपास में दस हजार हिन्दूओं के कत्ल की बात क्यों नहीं करते,हैदराबाद में दंगों में अब तक कई हजार हिन्दूओं के कत्ल की बात क्यों नहीं करते,काश्मीर के पंडितों की बात क्यों नहीं करते।क्या इन्साफ सिर्फ मुसलमानों को मिलना चाहिए।कितनी हास्यापद बात है कि गुजरात के विकास को देखते हुए मुसलमान तो मोदी को माफ करने को तैयार है पर धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार हिन्दू उनको बार बार रोक रहे हैं।कांग्रेस को दस प्रतिशत मुसलमानों की भावनाओं की चिंता तो है पर नब्बे प्रतिशत उन हिन्दूओं की चिंता नहीं है जिन्होंने मोदी को बार बार चुन कर भेजा।


Monday, September 5, 2011

फिर भी इन नेताओं से वो कोठे वाली अच्छी थी

गजल


अब भी क्या शक है तुम को इस से तो गुलामी अच्छी थी

जो नाम कमाया है अब तक इससे गुम नामी अच्छी थीगजल



बेच के माँ को जेब भरी लानत है ऐसे बेटों पर

इससे तो मैं कहता हूँ गरीबी की कहानी अच्छी थी


घर में अंधेरा होता था पर दिल में सवेरा होता था

बिन बिजली के दीपों की वो होली दिवाली अच्छी थी


मिर्च से रोटी खाई लेकिन बच्चे बेचे नहीं कभी

शर्म जेब में थी कम से कम पैसों से खाली अच्छी थी


दुनिया भर से गाली खाके भिखारी ने ये बात कही

माँ का दल्ला कहलाने से हर एक गाली अच्छी थी


जिस्म बेच कर बच्चे पाले मजबूरी थी वेश्या की

फिर भी इन नेताओं से वो कोठे वाली अच्छी थी


लक्ष्मी नारायण अग्रवाल