Wednesday, October 19, 2016

)                           सूफी-घात                 
          दुनिया भर में दो देशों या दो राजाओं के बीच युद्ध सदियों से होते आए हैं,हमेशा यही होता था कि विजयी राजा पराजित राज्‍य पर शासन करता था या फिर धन और स्‍त्रीयां लूट कर वापस चला जाता था,आम आदमी के जीवन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता था।लेकिन इस्‍लाम आने के बाद सबसे पहले तो मुहम्‍मद ने पूरे अरब को एक छत्री के नीचे किया जिससे सारे राज्‍यों की सेना मिलाकर एक विशाल सेना बन गई।रोज आपस में युद्ध करने वाला अरब जिस प्रकार इस्‍लाम मे नाम पर एक हुआ उससे उनको समझ में आ गया कि यदि दुनिया पर लम्‍बे समय तक राज करना है तो सैनिक अभियान को मजहबी अभियान बना कर ही किया जा सकता है इससे न केवल नियमित सेना के खर्च से बचा जा सकता है बल्‍कि अभियान को अनन्‍त समय तक चलाया जा सकता है।इसके लिए न केवल सैन्य विजय प्राप्‍त करनी होगी बल्‍कि विजित राज्‍यों के लोगों को मुसलमान बना कर अरबी संस्‍कृति फैलानी पड़ेगी।पूरी दुनिया के लोग जब मक्‍का मदीना के श्रद्धालु हो जाएंगें तो अपने आप पूरी दुनिया में अरब वालों का स्‍थाई शासन हो जाएगा।
                          712 मुहम्‍मद बिन कासिम ने सिन्‍ध पर हमला करके राजा दाहिर को हरा कर सिंध पर कब्‍जा कर लिया लेकिन प्रारम्‍भिक मार काट लूट और बलात्‍कार के बाद जब शासन स्‍थापित करने की बात आई तो मजबूरी में हिन्‍दूओं की मदद लेनी पड़ी क्‍योंकि अरब से आए सैनिक न तो पर्याप्‍त थे ओर न ही उनको प्रशासन चलाना आता था।इसके साथ साथ भारत में आगे बढ़ने के लिए भी उनको सैनिकों की जरूरत थी इसके लिए भी उनको हिन्‍दूओं में से ही भरती करना पड़ा।तब मुस्‍लिम सेनाओं के साथ आए विचारकों ने तेजी से हिन्‍दुओं को मुसलमान बनाने की योजना बनाई उन्‍होंने समझा था कि जैसे अरब को तेजी ये मुसलमान बना लिया है वैसे ही यहॉ भी बना लेगें।लेकिन ये काम युद्ध जीतने से कहीं ज्यादा मुश्‍किल निकला क्‍योंकि भारतीय दर्शन इतना विकसित था कि तर्कों से किसी हिन्‍दू को मुसलमान बना पाना असम्‍भव था।मुसलमानों ने कहा कि आत्‍मा नहीं होती तो हिन्‍दूओं ने पूछा कि बिना आत्‍मा प्राणी और परमात्‍मा के बीच सम्‍बन्‍ध कैसे स्‍थापित हो सकता है ईश्‍वर के लिए की गई भक्‍ति कैसे ईश्‍वर तक पहुंचेगी।मुसलमानों ने कहा कि सभी मृत व्‍यक्‍तियों का फैसला कयामत के दिन होगा ,कयामत के दिन सारे मुर्दे उठ खड़े होंगे तब अल्‍लाह उनका फैसला करेगा तो हिन्‍दूओं ने पूछा लाखों वर्षों मर रहे लोग कयामत तक कहॉ रहेगें ,यदि आत्‍मा नहीं हे तो कयामत के दिन फैसला किसका होगा शरीर तो मिट्टी में मिल चुका है।मुसलमान जब जवाब नहीं दे पाए तो हिन्‍दुओं ने बताया मोक्ष पाकर आत्‍मा का परमात्‍मामें विलय होने तक पुर्नजन्‍म होता रहता है।मुसलमानों ने कहा कि ईश्वर एक है और उसका नाम अल्‍लाह है तो हिन्‍दुओं ने कहा कि निश्चित ही परम पिता परमात्मा एक है ओर वही सब प्राणियों में है लेकिन ईश्‍वर निराकार है इसलिए उसका कोई नाम नहीं है अलग अलग लोग अलग अलग नामों से बुला सकते हैं।मुसलमानों ने कहा कि केवल नमाज पढ़कर ही वन्‍दना हो सकती हे तो हिन्‍दुओं ने कहा कि मन में श्रद्धा हो तो वन्‍दना का हर तरीका सही है।मुसलमानों ने कहा कि मुसलमानों का अल्‍लाह हिन्‍दुओं के परमात्‍मा से अलग हे तो हिन्‍दूओं ने पूछा कि यदि ऐसा हे तो मुसलमानों की धरती आसमान पानी हवा सूरज चॉद सितारे अलग क्‍यों नहीं हैं।मुसलमानों ने कहा कि पत्‍थर की मूरत की पूजा करना पाप है तो हिन्‍दुओं ने कहा कि पत्‍थर में मुसलमानों को भी तो एक छवि दिखाई देती है तभी तो काबा में पत्‍थर को शैतान मान कर पत्‍थर मारते हैं।अन्‍तर केवल इतना है कि हिन्‍दुओं को पत्‍थर में भगवान दिखाई देते हें और मुालमानों को शैतान दिखाई देता है।नौबत ये आ गई हिन्‍दुओं को मुसलमान बनान तो दूर उल्‍टे मुसलमानों के हिन्‍दू बनने का खतरा पैदा हो गया।इससे डर कर सबसे पहले तो मुसलमान मौलवियों ने इस्‍लाम में सुधार और चर्चा पर प्रतिबन्‍ध लगा दिया फिर बाद में इस्‍लामीकरण के लिए सूफीयों की मदद लेने का फैसला किया।इससे पहले कि हम सूफीयों के इतिहास पर जाएं ये समझ लें कि अरब के लोग कितने शातिर थो और लोगों को मुसलमान बनाने के लिए क्‍या क्‍या कर सकते है।
                         भारत एक विशाल देश था,यहॉ विज्ञान और दर्शन इतना विकसित था कि तर्क द्धारा किसी को मुसलमान बना पाना असम्भव था इसलिए मुस्लिम सेनाओं और उलेमाओं ने नए नए रास्ते खोजे।भारत में इस्लाम की पहली मस्जिद पैगम्बर मुहम्मद साहब के जीते जी सन् 629 में ही केरल के मालाबार क्षेत्र में बन गई थी,ये मस्जिद अरब से व्यापार करने आए मुसलमानों ने बनवाई।ये वही क्षेत्र हे जहॉ 1920 में बहुत बड़ा दंगा हुआ था जिसमें हजारों हिन्दू मारे गए हिन्दू औरतों की इज्जत लूटी गई और लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया,बाद में जब ब्रिाटिश फौजों ने कार्यवाही की तो दो हजार मुसलमान मारे गए तब जाकर स्थिति सम्भली।केरल का ये क्षेत्र आज भी मुस्लिम बहुल है मुस्‍लिम कट्टर पंथियों का अड्डा है।शुरू में कुरान लिखित में नहीं थी इसलिए भारत के लोगों को ये नहीं पता था कि इस्लाम न केवल हिन्दू विरोधी है बल्‍कि ये माना जाता है कि जो मुसलमान नहीं है वो मुसलमान का दुश्‍मन है।ना ही हिन्‍दुओं को ये खबर थी कि अरब में किस तरह मुहम्मद साहब तलवार के दम पर इस्लाम फैला रहे थे।इस्लाम के बारे में धारणाएं व्यापारी मुसलमानों के व्यवहार और बयान से बनती थीं,हिन्दू वही समझते थे जो मुसलमान समझाते थे।अरब के मुसलमान बहुत ही शातिर लोगों में से एक थे।प्रारम्भ में मुहम्मद साहब को जब इस्लाम का ज्ञान आया और उन्होंने ये ज्ञान मक्का के लोगों को देना शुरू किया लेकिन इतना भंयंकर विरोध हुआ कि नौबत मक्का को छोड़ने तक आ गई।मुसलमानों का 5 स्त्रीयों और 12 पुरूषों का पहला जत्था निकल कर दक्षिण की ओर गया और अबीशिया राज्य (अब इथोपिया और सूडान) पहुंच गया लेकिन मक्का वालों ने वहॉ भी उनका पीछा किया और वहॉ के ईसाई राजा नेगस से मुसलमानों को पनाह न देने की प्रार्थना की।नेगस ने इन्साफ करने की नीयत से जानना चाहा कि मामला क्या है।इसके लिए उसने मुसलमानों को दरबार में बुलाया और इस्लाम के बारे में बताने को कहा।मुसलमानों के इस जत्थे में मुहम्मद साहब के ताउ और संरक्षक अबू तालीब का बेटा जफर भी था,उसने कहा कि अब तक अरब के लोग अन्जान थे,बुतों की पूजा कर रहे थे,बासी मांस खाते थे,भोग लालसा में लिप्त थे रिश्तों के मोह में फंसे हुए थे और शक्तिशाली कमजोर लोगों का शोषण कर रहे थे।अल्लाह ने मुहम्मद के माध्यम से हमें सही रास्ता दिखाया है।आगे जफर ने स्थिति को समझाते हुए बड़े सुन्दर ढंग से कुरान की वो आयतें सुनार्इं जिनमें ईसाईयों की देवी मदर मेरी और प्रभु ईशु का सम्मान देते हुए वर्णन किया गया है।सुनने के बाद पूरा दरबार ऑसू बहा रहा था।तब नेगस ने मुसलमानों को बाहर निकालने से मना कर दिया।इसी तरह मालाबार या अन्य क्षेत्रों में आए मुसलमान व्यापारियों ने हिन्दूओं को अपमानित करने वाली आयतें छुपा कर सिर्फ ऐसी आयतें पढ़ीं होगीं जिससे इस्लाम में सब कुछ अच्छा ही अच्छा नजर आए।इसलिए उनकी बातों से प्रभावित होकर वो लोग सबसे पहले मुसलमान बने जिनको समाज से शिकायत थी हिन्दूओं में ऊंच नीच या आर्थिक शोषण का शिकार थे।मोपला दंगों में भाग लेने वाले भी अधिकतर मजदूर वर्ग के ही थे।ये मुसलमान बनाने का पहला तरीका था जिसमें बहुत अधिक सफलता नहीं मिली जो मिली वो भी निम्न वर्ग तक ही सीमित होकर रह गई।
                             पूरी दुनिया को मुसलमान बनानें के लिए उलेमा कुछ भी कर सकते हैं कोई भी हथकंडा अपना सकते हैं।ऐसे भी उदाहरण हैं जहॉ लोग आर्थिक मदद की लालच में मुसलमान बने।तलवार के भय से मुसलमान बनाने से तो पूरा इतिहास भरा पड़ा है।दलितों को हिन्दूओं के खिलाफ भड़का के मुसलमान बनाने की बहुत कोशिश की गई लेकिन अधिक सफलता नहीं मिली।मिस्र के प्रसिद्ध मौलवी महमूद-अल-मसरी  मिस्र के एक टेलिवीजन चैनल पर फरमा रहे थे कि इस्लाम में झूठ बोलना मना है,इसके बावजूद कुछ परिस्थितियों में झूठ बोला जा सकता है।इसके लिए उन्होंने एक कहानी सुनाई।एक मुसलमान के घर के बगल में एक यहूदी रहता था वह बहुत ही अच्छा,नेक,ईमानदार और गुणवान इन्सान था।मुसलमान पड़ोसी ने सोचा क्यों न इस अच्छे इन्सान को मुसलमान बनने की दावत दी जाए।एक दिन उसने यहूदी को अपना प्रस्ताव सुनाते हुए कहा कि क्यों नहीं आप इस्लाम कबूल कर लेते हैं।इस पर यहूदी ने जवाब दिया ""निसंदेह इस्लाम में सारी विशेषताएं हैं,मुझे इस्लाम अच्छा भी लगता है पर समस्या ये है कि मुझे रोज शराब पीने की लत है और इस्लाम में शराब पीना मना हैं।'यहूदी की बात सुनकर मुसलमान बोला""कोई बात नहीं आप इस्लाम स्वीकार कर ले फिर शराब पी सकते हैं।''इस पर यहूदी ने खुश होकर इस्लाम स्वीकार कर लिया और शराब पीने की इच्छा प्रकट की तो मुसलमान ने कहा कि अब आप मुसलमान बन गए हैं इसलिए शराब नहीं पी सकते,अगर आप शराब पीएंगें तो इस्लाम के गुनहगार होगें और उसकी सजा मौत भी हो सकती है।इस कहानी से पता चलता है कि क्यों उलेमा पूरी दुनिया को मुसलमान बनाना चाहते हैं।असल में मुसलमान बनते ही आदमी उनकी मुठ्ठी में आ जाता है वो पूरी दुनिया को इस तरह अपनी मुठ्ठी में करना चाहते हैं।नाम खुदा का मर्जी उलेमा की।अब जाते हैं सूफीयों के इतिहास पर।
                           इस्लाम आने से पहले अरब में कवि परम्परा बहुत सशक्त थी।ये लोग कविताएं गढ़ते थे और पूरे अरब में घूम घूम कर सुनाते थे,भारत के साधुओं की तरह दान दया का महत्व समझाते थे इसीलिए समाज में उनका ऐसा ही सम्मान था जैसा कि भारत में साधुओं का होता था।अरब में पहले तो ये माना जाता था कि मृत्यु के बाद कोई जीवन नहीं है लेकिन अगर मृत्यु के बाद जीना है तो कवियों की कविताओं में जिया जा सकता है।इन कवियों की परम्परा और प्रभाव कितना ज्यादा था इसकी पता इस बात से चलता है कि हातिम ताई जिसके उपर सिनेमा बना,जिसकी अनेक कथाएं प्रचलित हें वो इन्हीं कवियों के कारण कथाओं में अमर हो गए।हातिम ताई और इस्लाम के अंतिम पैगम्बर मुहम्मद साहब जब बच्चे थे तो  दोनों अबू तालिब के घर में रहते थे।हातिम ताई भी उन्हीं के हम उम्र थे और मुहम्मद की ही तरह बिना मॉ बाप के थे और अबू तालिब के ही घर में रहते थे।फर्क इतना था कि हातिम ताई के पिता मरते समय काफी दौलत छोड़ गए थे इसलिए हातिम जब बड़े हुए तो उनको वो दौलत मिलगई।लेकिन हातिम बहुत ही ज्यादा बड़े दिल वाला इन्सान था लोगों की मदद करने में उसे आनन्द आता था।एक बार तीन यात्री वहॉ से गुजर रहे थे तो हातिम ने उनके लिए तीन ऊंटो की बलि दे दी।संयोग से वो तीनो कवि थे,वो हातिम की इस आव-भगत से इतने खुश हुए कि हातिम पर कविताएं लिख लिख कर पूरे अरब में गा गा कर हातिम को अमर कर दिया।
                  इस्लाम आने से पहले काबा की मस्जिद एक मन्दिर था जिसमें 360 मूर्तियां थीं जो इस्लाम आने के बाद सन्‍ 630 में मुहम्मद साहब की देखरेख में तोड़ कर या तो जला दीं गई या फिर सीढ़ीयों में चुनवा दी गई ताकि वो आते जाते मुसलमानों के पैरों तरह कुचली जाएं।इस्लाम आने के बाद अल्लाह के सिवा किसी और की स्तुति गान करना कुफ्र था जिसकी सजा मौत थी इसलिए ये सारे कवि जो पहले 360 देवी देवताओं के गीत गाया करते थे वो अल्लाह और इस्लाम के गीत गाने लगे।ये असली सूफी थे।वास्‍तव में सूफी परम्‍परा का जन्‍म मुस्‍लिम सम्राटों के दरबार में वैभव और विलासिता के विरूद्ध हुआ था। शुरूवात के सूफी जैसे कि रूबिया(8वीं शताब्‍दी) मन्‍सूर बिन हल्‍लाज(10वीं शताब्‍दी) असली सूफी थे जो ईश्‍वर और बन्‍दे के बीच प्रेम को सबसे बड़ा सम्‍बंध मानते थे धार्मिक रूढ़िया बन्‍धन नहीं थी,इन पर बौद्ध धर्म का प्रभाव था और गुरू शिष्‍य परम्‍परा थी जिनको फकीर और मुरीद कहते थे और परम्‍परा को सिलसिला कहते थे।10 वीं शताब्‍दी में जब खिलाफत तुर्कों के हाथ में आ गई तो फिर से इस्‍लाम में कट्टरवाद की लहर आ गई जो इन सूफीयों के विरूद्ध थे इसिलिए मन्‍सूर बिल हल्‍लाज को सजा देकर मार दिया गया।मन्‍सूर की हत्‍या के बाद सूफीयों में भारी परिवर्तन आया।सूफी अल गजाली (1112) ने सूफीवाद को इस्‍लाम से जोड़कर कहा कि भक्‍ति के लिए कुरान का ज्ञान होना जरूरी है अर्थात यहॉ से सूफीवाद कट्टर इस्‍लाम का ही एक अंग हो गया।इस समय सूफीयों में दो पंथ हो गए एक बा--शरा जोकि शरीयत के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध थे दूसरे बे--शरा जो कि शरीयत के प्रति प्रतिबद्ध नहीं थे।भारत में जो सूफी प्रारम्‍भ में आए वो बा--शरा थे,इन की केवल जीवन शैली ही सूफी थी विचारों से तो ये कट्टर और खूंखार मुस्‍लिम ही थे इनमें से बहुम से तो प्रशिक्षित सैनिक थे,  इनको भारत में मुस्‍लिम सेनाओं ने एक खास मकसद से बुलाया था।मुस्‍लिम सेनाओं को भारत में इस्‍लाम की खूबियां बताकर तर्क द्धार लोगों को मुसलमान बनाने की बहुत कोशिश लेकिन सफलता नहीं मिली।लेकिन  मुस्लिम सेनाओं ने जब देखा कि यहॉ साधुओं का बहुत सम्मान है तो इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए इन लोगों के इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई। अरब से इन जल्‍लाद सूफीयों को बुला लिया ये लोग मुस्लिम फौजों के साथ ही आए थे पर यहॉ आकर चोला बदलकर अपने को मुस्लिम साधु बता कर हिन्दूओं से भी सम्मान पाने लगे जिससे हिन्दू समाज में इनकी घुस पैठ हो गई।सच बात ये है कि सूफीयों के भेष में जो लोग आए उनमें अधिकतर मौलवी और फौज के जासूस थे,बाद में भारतीय दर्शन के प्रभाव से बुल्‍लेशाह जैसे सूफियों का विकास हुआ जो सच्‍चे लोग थे पर ये अधिकतर भारतीय मूल के लोग थे और इनको न तो इस्‍लाम में न ही मुस्‍लिम बादशाहों ने कोई महत्‍व दिया।इनको मुसलमानोंसे ज्‍यादा हिन्‍दूओं ने सम्‍मान दिया। विदेशों से आए सूफियों में अधिकतर हिन्‍दूओं की साधुओं के प्रति श्रद्धा का अनुचित लाभ उठाकर जासूसी करने और लोगों को मुसलमान बनाने का काम करते थे।
      यों तो भारत  में अधिकतर आम हिन्‍दू,बुद्धिजीवियों और नेताओं को इस्‍लाम और  मुसलमानों के बारे मे सही  जानकारी नहीं है पर सूफी मुसलमानों में ज्ञान जो अज्ञानता की चरम सीमा पर है। सूफीयों के बारे में प्रचार किया गया कि साधु परम्परा के लोग हैं गाते बजाते हैं इनको सत्ता से कुछ लेना देना नहीं है।लेकिन सच ये है कि साधु परम्परा भरतीय दर्शन की सन्यास परम्परा से निकली है जबकि इस्लाम में सन्यास की परम्परा दूर दूर तक नहीं हैं।इस्लाम में आदमी जब तक जीता है भोग करना उसका अधिकार है इसीलिए इस्लाम में 80 साल के आदमी का 14 साल की लड़की से व्याह करना अनैतिक नहीं माना जाता है।इसलिए सूफीयों को मुस्लिम साधु बताना भी मुसलमानों का एक षड़यंत्र था वास्तव में ये लोग तीन काम करते थे।
(1)     मुस्लिम सेनाओं द्धारा की गई हैवानियत का हिन्दूओं के दिमाग पर ये बता कर कड़ुवाहट कम करना कि इस्लाम में ये सब नहीं है इस्लाम तो बस अल्लाह का नाम लेकर मस्त रहना सीखाता है जिससे कि इस्लाम की छवि अच्छी बनी रहे और लोग मुसलमान बनते रहें।ये लोग सफल भी हुए क्यों कि किसी हिन्दू को नहीं पता था कि कुरान में क्या क्या है।इनकी नीति ठीक वैसी ही थी जैसी कि आज पाकिस्तान की है ,एक ओर तो पाकिस्तान की सरकार सेना और आतंकवादियों से हमले करवाती है दूसरी ओर बड़े ही भोले पन से प्रचारित करती हे कि क्या करें ये लोग हमारे बस में नहीं हैं।अगर ये लोग बस में नहीं हैं तो पाकिस्तान की सरकार कम से कम इनकी योजनाओं के बारे में गुप्त सूचनाएं तो भारत को दे सकती है पर सूचनाएं देने के बजाय उल्टा गुमराह करती रहती है।
(2)     इन सूफीयों का दूसरा काम ये था कि जो हिन्दू शिष्य बनते थे उनको मौका देखकर या कोई प्रलोभन देकर पहले मन्‍दिरों से, हिन्‍दू जीवन पद्धति से अलग थलग कर देना फिर मौका देखकर पूरा मुसलमान बना लेना।अर्थात पहले आधा फिर पूरा मुसलमान बना लेना।
(3)     तीसरा काम ये था कि हिन्दूओं का पैसा खींचते रहना।वास्तव में जब मुस्लिम सेनाएं भारत में आर्इं तो मन्दिरों का वैभव देखकर हैरान रह गई।इन सूफियों ने भी हिन्दूओं की मन्‍दिरों के प्रति श्रद्धा का लाभ उठाने की सोची और इस्‍लाम में मजारों की पूजा पर प्रतिबंध होते हुए भी मजारों को पुजवाना शुरू का दिया जिससे इनके पास हिन्दूओं की दौलत आने लगी और ये लोग उस दौलत को इस्लाम के प्रचार प्रसार में खर्च करने लगे,हिन्दूओं का पैसा बिना किसी मेहनत खून खराबे के मुसलमानों के पास पहुंचने लगा,ज्‍यादा से ज्‍यादा हिन्‍दूओं को वहॉ लाने के लिए इनके चमत्‍कारों का झूठा प्रचार किया गया।सारे मुस्‍लिम एक सुर में बोलते थे इसलिए भोले भाले हिन्‍दू जल्‍द ही इनके चक्‍कर में आने लगे।ये काम आज भी जारी है।इनके आने का एक मकसद और था वो ये नए बने मुसलमानों की मूर्ति पूजा की आदत को मजार पूजा में बदलना फिर धीरे धीरे पूरा मुसलमान बनाना।इनके इस काम की वजह से उनको मुसलमान बादशाहों के दरबार में भी सम्मान मिलने लगा,जबकि देखा जाए तो इस्लाम में मजारों की पूजा मना है।मौलवी अहमद रिजा खान एक ओर तो इतने कट्टर हें कि वो कहते हैं कि इस्लाम के फायदे के काम में भी हिन्दूओं की मदद लेना कुफ्र है मगर दूसरी ओर मजारों की पूजा की छूट देते हैं।
(4)      इनका चौथा काम था मुस्लिम सेनाओं के लिए जासूसी करना क्योंकि साधु की श्रद्धा इनके साथ जुड़ी होने के कारण ये लोग उन सैनिक क्षेत्रों में भी जा सकते थे जहॉ मुसलमान नहीं जा सकते थे।1991 में मुहम्मद घोरी पहला युद्ध पृथ्वीराज चौहान से हार गया था तभी अजमेंर के चिश्ती का आना हुआ एक साल बाद ही दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज घोरी से युद्ध हार गया,चिश्‍ती पहले दिल्ली और लाहौर में कार्यरत था पर पृथ्‍वीराज चौहान के पिरूद्ध षड़यंत्र के लिए विशेष तौर पर अजमेंर आया और वहीं रम गया चिश्‍ती भी बा--शरा सूफी था।चिश्‍ती ने की मुहम्‍मद घोरी को सलाह दी थी कि पृथ्‍वीराज चौहान को सीधे सीधे युद्ध में हराना सम्‍भव नहीं है इसलिए धोखे का सहारा लेना जरूरी है, घोरी ने वही किया पहले तो चौहान को संधिं प्रस्‍ताव भोजा फिर भोर होने से पहले हमला कर दिया जिससे पृथ्‍वीराज की सेनाएं सम्‍भल नहीं पाई और पृथ्‍वीराज पकड़ा गया।
            सूफी वाद के नाम पर आज भी भारत के लोगों को बेपकूफ बनाया जा रहा है।आज भी सूफी गायकी के नाम पर पाकिस्तान से गायक यहॉ आते हैं और लाखों रूपए या तो ले जाते हें या फिर यहॉ के पाकिस्तानी एजेन्टों को देकर चले जाते है,पाकिस्तान में वो पैसा उनको आई.एस.आई से मिल जाता है।अगर आप ध्यान से सुने तो आपको उनके गीतों के बोल समझ में नहीं आएंगें इन आयोजनों में जाना एक स्टेटस की निशानी हो गई हे लोग वहॉ सूफी गायन नहीं गायन के बाद मुर्गा पार्टी के लिए जाते हैं।भारत के मूर्ख हिन्दूओं को पता ही नहीं कि दुनिया का सबसे बड़ा सूफी संत कबीर भारत में हुआ था उसके दोहे कोई नहीं गाता।अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से बस अल्लाह के गीत गीए जाते हैं अगर ये धर्म निरपेक्ष मुसलमान हैं तो इनके गीतों में राम कृष्ण कबीर क्यों नहीं हैं।अकबर के राज के शुरूवाती दिनों में इन्हीं सूफीयों ने हिन्दू सन्यासियों पर सैंकड़ों हमले किए।सन्यासियों ने दरबार में शिकायत की लेकिन कुछ नहीं हुआ तो आत्मरक्षा में हथियार उठा के अपनी रक्षा की।
                 अबुल हसन यामीनुद्दीन खुसरो (1253 से 1325) जो हिन्‍दी में अमीर खुसरो देहलवी के नाम से प्रासिद्ध हैं ,निजामुद्दीन औलिया के शिश्‍य थे।इनको भारतीय साहित्‍य और संगीत में बहुत सम्‍मान प्राप्‍त है मगर यही खुसरो हिन्‍दूओं के समूल नाश चाहते थे।वो लिखते हैं ‘’हमारे मजहबी योद्धाओं की तनवारों के दम पर पूरा भारत ऐसा बन गया जैसे कि आग जंगल को कांटो से समाप्‍त कर देती है।हिन्‍द के शक्‍तिशाली लोगपांव के नीचे कुचल डाले गएं हैं।यदि शरियत ने हिन्‍दूओं को जजिया देकर जिन्‍दा रहने की छूट न दी होती तो हिन्‍द का नाम जड़ मूल से मिट गया होता।
         अकबर ने तब हिन्‍दूओं पर से जजिया कर हटाया तो सबसे ज्‍यादा विरोध सूफी शेख सरहिन्‍दी ने किया था।सरहिन्‍दी का कहना था कि इस्‍लाम की शान बनाए रखने के लिए और बढ़ाने के लिए हिन्‍दूओं को अपमानित करना जरूरी है।इसी प्रकार जब मराठों और सिखों के आक्रूण से मुगल शासन नष्‍ट होने ही वाला था तब सूफी वलीउल्‍लाह ने अफगानिस्‍तान के अब्‍दाली से भारत पर हमला करके उसे बचाया।पाकिस्‍तान में एक ईश निन्‍दा कानून है जिसके कारण वहॉ गैर मुसलमानों को रोज झूठे आरोप लगा कर मारा जा रहा है।ये कानून भी जनरल जिया पर दबाव डाल कर सूफी शेख उन इस्‍लाम ताहिर अल कादरी ने ही बनवाया था।उनका स्‍परूट कहना हे कि जो शरीयत और कुरान में पूरा विश्‍वास नहीं रखता अर्थात जो बा शरा नहीं है वो सूफी नहीं हो सकता।  
                     ऐसे ही एक थे  काश्मीर में सम्‍मानित और प्रसिद्ध सूफी सईद अली हमदानी (सन्‍.1314-1385)  ने तो हिन्दूओं पर इत्याचार करने में हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं।हमदानी ने हिन्दूओं के लिए ये नियम बनाए
1.हिन्दू कोई नया मन्दिर नहीं बनाएंगें।
2.पुराना मन्दिर अगर गिर गया तो उसको दोबार नहीं बनाएंगें।
3.मुसलमान यात्रियों को मन्दिरों में ठहरने दिया जाएगा।
4.मुसलमान यात्रियों को तीन दिन तक हिन्दू अपने घर में ठहराएंगें,खिलाएंगें,पिलाएंगें।
5.हिन्दू  न तो जासूसी करेगें और न ही जासूसों को शरण देगें।
6.अगर कोई हिन्दू इस्लाम स्वीकार करना चाहे तो उसे रोका नहीं जाएगा।
7.हिन्दू सभी मुसलमानों को इज्जत देगें।
8.जो मुसलमान उनकी किसा सभा में आना चाहे उनको सम्मान दिया जाएगा।
9.हिन्दू लोग मुसलमानों के जैसे कपड़े नही पहनेगें।
10.हिन्दू मुसलमानों के जैसे नाम नहीं रखेगें।
11.हिन्दू जीन लगा कर घोड़े पर नहीं चढेगें।
12.हिन्दू  तलवारें और तीर कमान नहीं रखेगें।
13.वो अंगूठी नहीं पहनेगें।
(6)
14.वो खुलेआम शराब आदि नहीं बेचेगें।
15.वो अपनी परम्परागत पोशाक ही पहनेगें ताकि मुसलमानो ये अलग दिखें।
16.वो मुसलमानों के बगल में अपना घर नहीं बनाएंगें।
17.वो अपने शवों को मुस्लिम शमशान के पास नहीं जलाएंगें।
18.वो मुस्लिम गुलामों को नहीं खरीदेगा।
19.किसी की मौत पर हिन्‍दू जोर जारे से रोएगें नहीं।
                 इसी हमदानी काश्मीर के काली मन्दिर को तुड़वाया था,उसी जगह पर आज उसकी दरगाह बनी हुई है।ये है उस समय बाहर से आए सूफियों का असली चेहरा।

                                             लक्ष्‍मी नारायण अग्रवालल

                        









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